मुस्लिम महिलाएं हिजाब क्यों पहनती हैं?

मुस्लिम महिलाएं अपना सिर ढकने के लिए हिजाब पहनती हैं न कि अपने दिमाग के लिए! हिजाब पहनने से किसी भी महिला की तरक्की नहीं रुकती। मदर टेरेसा ने भी अपना सिर ढक लिया। क्या हमने उसे उत्पीड़ित कहा? केवल मुस्लिम महिलाओं को सिर ढकने के लिए उत्पीड़ित क्यों कहा जाता है?

कई लोग हिजाब को मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न के रूप में देखते है। आइए पता करते है इस बात में कितनी सच्चाई है।

वास्तव में हिजाब है क्या?

हिजाब एक इस्लामी ड्रेस कोड है जो मुस्लिम महिला के परिधान को लेकर कुछ विशेष दिशा निर्देश तय करता है ! इस्लाम के अनुसार एक महिला को कलाई और चेहरे को छोड़ कर पूरे शरीर को उचित सभ्य वस्त्र से कवर करना चाहिए!

क्या कुरान हिजाब का प्रावधान करता है?

हाँ। ईश्वर कुरान में कहते है:

और ईमान वाली स्त्रियों से कहो कि वे अपनी नज़रों को नियंत्रित रखें और अपनी विशेष अंगों की रक्षा करें, अपनी सुंदरता को प्रकट न करें सिवाय उसके जो समान्य रूप से प्रकट हो जाती हो। वो अपने सीने पर अपने ओढ़नी का आंचल डाले रखे, और उनकी छिपी हुई सुंदरता को प्रकट न करें।

क़ुरान 24:31

इस्लाम पुरुषों के लिए भी ड्रेस कोड निर्धारित करता है

ऐसा नहीं है कि इस्लाम सिर्फ महिलाओं के लिए ड्रेस कोड तय करता है बल्कि इस्लाम में पुरुषों के लिए भी ड्रेस कोड निर्धारित किया गया है। ड्रेस कोड में कई शर्तें पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान हैं। पुरुषों और महिलाओं दोनों से उम्मीद की जाती है कि:

  1. वस्त्र मामूली होनी चाहिए, अश्लील या अभद्र नहीं होनी चाहिए।
  2. वस्त्र ढीली होनी चाहिए ज्यादा तंग फिटिंग नहीं होनी चाहिए जिससे की शरीर के अंग की बनावट ज़ाहिर हो!
  3. वस्त्र इतना पारदर्शी नहीं होनी चाहिए कि शरीर के अंदरूनी अंग दिखे!

पुरुषों और महिलाओं के ड्रेस कोड के बीच अंतर

पुरुषों और महिलाओं के ड्रेस कोड के बीच एकमात्र अंतर यह है कि उन्हें अपने शरीर को किस हद तक कवर करना चाहिए। जबकि महिला को कलाई एंव चेहरे को छोड़कर अपने पूरे शरीर को कवर करने को कहा गया है जबकि ,एक पुरुष से अपेक्षा की जाती है कि वह नाभि से घुटनों तक अपने शरीर को ढक कर रखेगा।

पुरुष और महिलाएं समान हैं – तो यह अंतर क्यों है?

ये बिल्कुल सच है कि , पुरुष और महिलाएं समान हैं लेकिन वे शारीरिक विशेषताओं में एक दुसरे से भिन्न हैं। पुरुषों और महिलाओं की शारीरिक विशेषताएं अलग-अलग हैं। ये बात पूरी दुनिया में हर धर्म और हर समाज में देखी जाती है कि पुरुषों के तुलना में महिलाओं को कुछ अधिक अंग को ढकना होता है। इस्लाम में भी दोनों के लिए अलग अलग ड्रेस का प्रावधान करने को कहा गया है ! आइए तैराकी का उदाहरण लें, एक ऐसा खेल जिसमें एथलीट न्यूनतम नंगे पोशाक पहनते हैं। क्या पुरुष तैराक और महिला तैराक के लिए पोशाक समान है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? यहाँ ये कहना बिल्कुल अनुचित होगा कि पुरुष और महिलाएं समान हैं, तो दोनों के लिए एक ही पोशाक क्यों नहीं है?

क्या पुरुष और महिला तैराकी के लिए अलग अलग ड्रेस कोड के प्रावधान को उन दोनों के बीच असमानता के तर्क के रूप में देखा जा सकता है? अब आपको ये स्पष्ट हो गया होगा कि समान्य तौर महिलाओं को पुरुष की तुलना में अपने शरीर के अधिक अंगों को ढकने की ज़रुरत होती है।

क्या महिलाओं को अपने शरीर को ढकना चाहिए?

एक महिला का शरीर एक पुरुष के लिए बेहद आकर्षक होता है। अब आपका ये भी प्रशन होगा कि महिलाएं भी एक पुरुष के शरीर के प्रति आकर्षित होती हैं। हां, वे भी आकर्षित होती हैं लेकिन इन दोनों आकर्षण को सामान रूप से नहीं देखा जा सकता है। क्या आपने कभी महिलाओं के बारे में सुना है जो पुरुषों के साथ बलात्कार करती हैं? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? क्या महिलाएं पुरुषों की ओर आकर्षित नहीं होती हैं? हां, वो आकर्षित होती हैं, लेकिन एक पुरुष और एक महिला के लिए यौन उत्तेजना अलग है। हर वयस्क ये अनुभव कर सकता है।

जब एक महिला अपने शरीर को उजागर करती है, तो अधिकांश पुरुष उसे वासना की नज़र से देखते हैं। जिनमें कुछ सिर्फ महिला को देखने के साथ रुक जाते हैं, कुछ अपने दोस्तों के बीच अश्लील टिप्पणियां साझा कर सकते हैं, कुछ कल्पना करना शुरू कर सकते हैं, कुछ अश्लील टिप्पणियां पारित करना शुरू कर सकते हैं, कुछ उसका पीछा करना शुरू कर सकते हैं और कुछ लोग अवसर मिलने पर उनके साथ छेड़छाड़ भी कर सकते हैं । हर किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह इस नग्न वास्तविकता के लिए अपनी आंखें और दिमाग बंद कर लेगा।

समान्य रूप से जब एक महिला अपने शरीर को उजागर करती है तो पुरुषों के लिए वासना की वस्तु ही बन जाती है। चाहे उसे महीला स्वतंत्रता के नाम पे कितना भी अच्छे तरह से प्रस्तुत किया जाए! यदि फिर भी आप महिला स्वतंत्रता को सिर्फ उसके शरीर प्रदर्शन के साथ जोड़ कर देखना चाहते है, तो यह आपका विशेषाधिकार है।

इस्लाम चाहता है कि महिलाओं का सम्मान किया जाए इसलिए इस्लाम महिलाओं का इस तरह के यौन वस्तुकरण बनने की अनुमति नहीं देता है । इस्लाम महिलाओं को विकृत पुरुषों के कुंठित सोच, शोषण और वासनापूर्ण नज़रों से बचने की ओर मार्गदर्शन करता है।

क्या हिजाब महिलाओं के विकास को दबाता है?

याद रखें, मुस्लिम महिलाएं अपने सिर को ढंकने के लिए हिजाब पहनती हैं, न कि उनके दिमाग को! हिजाब पहनने से किसी भी महिला की प्रगति नहीं रुकती है। आइए मदर टेरेसा का उदाहरण लेते हैं। वह मुसलमान नहीं थी। उस पोशाक को देखिये जो वो पहनती थी। उनके चेहरे और हाथों के अलावा, उनका पूरा शरीर ढका हुआ रहता था। मूल रूप से, मदर टेरेसा ने हिजाब ही पहना था। क्या उनका पोशाक, उनके कार्य एवं उपलब्धि में कभी बाधा बना था ? निसंदेह जवाब न ही होगा ।

आइए एक और उदहारण लेते है तवक्कुल करमान जो मिस्र की एक मुस्लिम महिला है, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से प्रुस्कृत किया गया है। वह भी हिजाब पहनती है, पर उनका हिजाब पहनना उनके प्रगति और उपलब्धि के मार्ग में कभी रुकावट नहीं बना । इसी तरह दुनिया भर में, हम लाखों हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए देख सकते हैं। हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिलाएं डॉक्टर, इंजीनियर, पीएचडी स्कॉलर, टीचर, पायलट आदि सभी पदों पे अपनी उत्कृष्ट सेवा दें रहीं हैं। गूगल पे खोज करने से आपको ऐसे महिलाओं की एक लंबी सूची देखने को मिल जायगी । अब आपको यह स्पष्ट हो गया होगा कि हिजाब महिलाओं की प्रगति को नहीं रोकता है।

वैसे, क्या मदर थेरेसा नाम के किसी महिला को उसके पोशाक के कारण कभी उत्पीड़ित किया गया है? क्या कभी कैथोलिक ननों को उसके पोशाक को लेकर कोई टिपण्णी की जाती है? तो फिर मुस्लिम महिलाओं के साथ ऐसा दोहरा मापदंड क्यों ? ये आप तय कीजिए।

क्या मुस्लिम महिलाएं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जाता है?

इस्लाम हमेशा मनुष्य के अपनी पसंद से उसकी आस्था पे विश्वाश करने को कहता है और एक व्यक्ति को भी अपनी स्वेच्छा से ईश्वर के आदेशों का पालन करना चाहिए । किसी को भी ये अधिकार नहीं दिया गया है की वो किसी मुस्लिम पुरुष या महिला को इस्लाम का पालन करने के लिए मजबूर करे। ईश्वर कुरान में कहते है:

इस धर्म (इस्लाम) में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। यक़ीनन हिदायत (सीधी राह) और गुमराही (भटका देने वाली राह) के बीच अंतर स्पष्ट हो गया है।

क़ुरान 2:256

अगर जो कोई भी मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर करता है (जब महिलाएं खुद हिजाब नहीं पहनना चाहती हैं), निसंदेह वे कुरान के मार्गदर्शन का पालन नहीं कर रहा हैं।

क्या मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनने के लिए मजबूर हैं? – ब्रिटिश नारीवादी द्वारा उत्तर।

मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक रूप से अपनी धार्मिक पहचान क्यों दिखानी चाहिए?

जो लोग यह सवाल पूछते हैं, हम उनसे पूछना चाहते हैं कि अगर महिलाएं सार्वजनिक रूप से हिजाब पहनती हैं तो वे किस तरह से प्रभावित होते हैं। सार्वजनिक रूप से हिजाब पहनने वाली महिलाएं किसी को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। तो, मुद्दा क्या है?

भारत बहु-धर्मों और बहुसंस्कृति का देश है। क्या मुस्लिम महिलाएं ही सार्वजनिक रूप से अपनी धार्मिक पहचान प्रदर्शित करती हैं? नहीं। हिंदू महिलाएं भी ऐसा ही करती हैं। क्या “घुंघट” और “बिंदी एवं सिंदूर” कुछ हिंदू महिलाओं की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा नहीं है?

क्या हिंदू महिलाएं अपने माथे पर कुमकुम नहीं पहनती हैं जो उनकी धार्मिक पहचान को दर्शाती हैं? ये किसी के लिए एक समस्या कैसे हैं? यदि न्यायाधीश जो सभी धर्मों के लोगों को न्याय देने का काम करते हैं, अपने माथे पर तिलक का उपयोग कर सकते हैं और अपनी धार्मिक पहचान प्रदर्शित कर सकते हैं, तो मुस्लिम महिलाएं सार्वजनिक रूप से हिजाब क्यों नहीं पहन सकती हैं?

समाप्ति

प्राचीन काल में, मनुष्य लगभग नग्न घूमते थे। सभ्यता और बुद्धि में उन्नति के साथ साथ, मनुष्य ने शालीनता सीखी और खुद को कपड़ों से ढंकना सीखा । हम जो पोशाक पहनते हैं वह हमारी शालीनता और बुद्धि की अभिव्यक्ति है। मुस्लिम महिलाएं या कैथोलिक महिलाएं जो खुद को सभ्य कपड़ों के साथ कवर करने का फैसला करती हैं, सभ्यता और बुद्धि के उच्चतम रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्हें अपनी मर्ज़ी से पोशाक पहनने के अधिकार से रोकना एवं उन्हें शारीरिक पर्दर्शन के लिए मजबूर करना ही वास्तव में उत्पीड़न है!

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