क्या कुरान में हिंदुओं को काफिर कहकर गाली दी जाती है?

क्या काफ़िर एक गाली सूचक शब्द है ? नहीं ! काफ़िर, मुस्लिम का एक विपरीतार्थक शब्द है| दुनिया के हर धर्म में मानने और नहीं मानने वाले लिए विपरीत अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग किया जाता है जैसे की हिन्दू धर्म में विदेशी आस्था वाले या गैर वैदिक मूल वाले को ‘मेलाचास’ कह कर संबोधित करते है

कई लोगों को यह गलतफहमी है कि कुरान में हिंदुओं को काफिर कहकर पुकारा जाता है जिसे वो एक गाली जैसा शब्द समझते है। आइए पता करते है कि उनका ऐसा सोचना कहाँ तक सही हैं?

“काफिर” दरअसल “मुस्लिम” के विपरीत अर्थ में प्रयोग किया जाने वाला एक शब्द मात्र है

दुनिया के हर भाषा में प्राय हर शब्द का एक प्रतिकूल/विलोम/विपरीतार्थक शब्द होता है जिसका अर्थ मूल शब्द के विपरीत होता है |

उदाहरण के लिए : अच्छा-बुरा, दायें-बाएँ, शिष्ट और अशिष्ट आदि। इसी तरह, मुस्लिम के लिए प्रयोग किया जाने वाला विलोम (विपरीत शब्द) काफिर है। आइए अब हम “मुस्लिम” और “काफिर” दोनों शब्दों के अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं।

मुस्लिम और काफिर शब्द का अर्थ

शब्द “मुस्लिम” का मूल अर्थ “मान लेने वाले या समर्पण करने वाला ” है| इस शब्द का उपयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता है जो निम्नलिखित बातों में विश्वास करता है:

  1. ईश्वर केवल एक है
  2. ईश्वर को किसी भी चीज़ की या किसी की आवश्यकता नहीं है
  3. ईश्वर के माता-पिता या बच्चे नहीं हैं
  4. ईश्वर जन्म, प्रजाति या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता है।
  5. ईश्वर के पास नींद, बीमारी, याददाश्त में कमी आदि जैसी कोई कमजोरी नहीं है।
  6. ईश्वर के बराबर कोई नहीं है
  7. मौत के बाद एक और जीवन है जहां लोगों को ईश्वर के समक्ष दुनिया में किए गए कार्यों का लेखा जोखा प्रस्तुत करना एवं उसका उत्तर देना है जिसके आधार पर प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों का पूरा पूरा न्याय मिलेगा । इसके आधार पर अच्छे लोग स्वर्ग में जायंगे और बुरे लोग नरक में।
  8. पैगम्बर मुहम्मद (उन पर शांति हो) को ईश्वर ने पूरे संसार के मनुष्यों के लिए मार्गदर्शक बनाकर भेजा गया है।

काफिर शब्द का मूल अर्थ “इंकार करने वाला ” है | जैसा कि हमने ऊपर देखा, “काफिर” शब्द “मुस्लिम” शब्द के विपरीत अर्थ में प्रयोग होता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से, कोई भी व्यक्ति जो ऊपर दिए गए आठ बिंदुओं में विश्वास नहीं करता है, उसे “काफिर” कहा जाता है।

“काफिर” एक अपमानजनक शब्द नहीं है

विपरीत शब्दों का उपयोग हर धर्म में किया जाता है। हिंदू धर्म ऐसे लोगों को संबोधित करने के लिए “मेलेचास” शब्द का उपयोग करता है जो विदेशी हैं या गैर-वैदिक मूल के हैं। ईसाई धर्म और यहूदी धर्म, उन लोगों को संबोधित करने के लिए “अन्यजातियों” शब्द का उपयोग करता है जो इस्राएली नहीं हैं।

हिंदी में, हम “विदेशी” को संबोधित करने के लिए “फिरंगी” शब्द का उपयोग करते हैं। हर प्रमुख शहर में एक “विदेशी पंजीकरण कार्यालय” होता है। क्या भारत में एक अमेरिकी या जर्मन को “विदेशी” कहना उसके लिए अपमान की बात समझी जाती है ? जाहिर है, नहीं! “काफिर” शब्द का प्रयोग भी ठीक उसी तरह है जैसे ऊपर के वाक्य में विदेशी शब्द का प्रयोग हुआ है। यह एक अपमान या दुरुपयोग नहीं है, बल्कि इसका उपयोग केवल मुस्लिम शब्द के विपरीत अर्थ को चिन्हित करने के लिए किया जाता है।

कुरान में हिंदुओं सहित सभी मनुष्यों को सम्मानित किया गया है

कुरान में ईश्वर स्पष्ट रूप से कहते हैं:

हमने आदम की सन्तान का सम्मान किया है

अध्याय 17:70

इस्लाम पूरी मानव जाति को सिखाता है कि वह एक आदम की संतान है और हम सभी एक ही “मानव परिवार” से संबंधित हैं। पूरी मानवता को ईश्वर द्वारा सम्मानित किया गया है। इसमें मुस्लिम, हिन्दू, ईसाई और सभी धर्मों के लोग भी शामिल हैं। अगर ऐसा है तो हिंदुओं के अपमान का सवाल ही कहां उठता है?

एक “मुस्लिम” काफिर भी हो सकता है

“मुस्लिम” और “काफिर” दोनों शब्द लोगों द्वारा किए गए कार्यों से संबंधित हैं। इसलिए, किसी व्यक्ति के लिए इन दोनों शब्दों में कौन सा शब्द प्रयोग किया जाएगा ये उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों से निर्धारित होता है । इसलिए, कोई व्यक्ति एक मुस्लिम केवल ईश्वर के आदेशों पर विश्वास करने और उनका पालन करने से बनता है, न की सिर्फ इसलिए कि वह एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ था या उसका नाम सुल्तान और शेख़ है । एक व्यक्ति का एक मुस्लिम नाम हो सकता है, लेकिन ईश्वर में अपने अविश्वास के आधार पे वो एक काफिर भी हो सकता है।

पैगंबर मुहम्मद(स०) ने कहा:

जो प्रार्थना को छोड़ देता है (जानबूझकर प्रार्थना के दायित्व को अस्वीकार करता है और पश्चाताप नहीं करता है) वह काफिर है।

जैसा कि आप देख सकते हैं, यहाँ उन लोगों को संबोधित किया जा रहा है जिन्हें समाज में “मुस्लिम” माना जाता है।

अब आपको यह स्पष्ट हो गया होगा है कि “काफिर” शब्द विशेष रूप से हिंदुओं या गैर-मुस्लिमों के लिए ही उपयोग नहीं किया जाता है बल्कि एक मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति भी अपने विश्वास के आधार पर काफ़िर हो सकता है और इस शब्द का उपयोग कभी भी किसी का अपमान करने के लिए नहीं किया जाता है।

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