बलात्कार के समाधान की तलाश

रेप के मामले में भारत दुनिया में अन्य देशों के मुक़ाबले में तीसरे पायदान पर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 22 मिनट में एक महिला का रेप होता है। इस हिसाब से भारत में प्रतिदिन लगभग 65 महिलाओं का बलात्कार होता है। क्या इस समस्या का कोई व्यावहारिक समाधान हो सकता है? चलिए पता लगाते है।

  • सालभर में हुए रेप के आकड़ों को देखा जाए तो पता चलता है कि इस मामले में भारत दुनिया के अन्य देशों के मुक़ाबले में तीसरे पायदान पर है, जो कि सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद आता है।
  • भारत में हर 22 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है। इस हिसाब से भारत में हर दिन लगभग 65 महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है।
  • भारत के कुछ हिस्से ऐसे है जहाँ हर दिन औसतन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है।
  • स्वतंत्रता के बाद हमारे देश में, हत्या, डकैती और अपहरण जैसे अपराधों में क्रमशः 106%, 27%, और 298% की वृद्धि हुई है। जबकि बलात्कार की दर में 792% की वृद्धि हुई है। इसका मतलब है कि 1947 के बाद से भारत में बलात्कार की दर लगभग 9 गुना बढ़ गई है।

(संदर्भ: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो)

किसी भी बीमारी का समाधान चाहे वह सामाजिक हो या शारीरिक, केवल तभी प्रभावी होता है जब बीमारी के मूल कारणों को ध्यान में रखा जाए और उनका ठीक से विश्लेषण किया जाए। आइए सिरदर्द के उदाहरण से इस बात को समझते हैं। सिरदर्द विभिन्न कारणों से हो सकता है जैसे कि सामान्य सर्दी, आंखों का दोष, ब्रेन ट्यूमर, साइनसाइटिस, नींद की कमी, भूख या प्यास, आदि। एक अच्छा डॉक्टर, इस दर्द का इलाज करने से पहले, इसके कारण का पता लगाना ज़रूरी समझेगा। इसी तरह, बलात्कार के प्रभावी समाधान को खोजने से पहले, हमें इस मानसिकता की मूल कारणों की पहचान कर पहले उसे खत्म करने की आवश्यकता है।

इससे पहले कि हम बलात्कार की समस्या का समाधान ढूँढना शुरू करें, हमें जानना चाहिए कि बलात्कार के कितने प्रकार होते है। आमतौर पर, बलात्कार के पीछे के उद्देश्य के आधार पर, इस बुरे कृत्य को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।

  1. शक्ति बलात्कार – इस प्रकार के बलात्कार की घटना एक शक्तिशाली वर्ग द्वारा किसी कमज़ोर और मजबूर वर्ग पर वर्चस्व एवं प्रभुत्व स्थापित करने के लिए किया जाता है। उदाहरण : दंगों के दौरान बलात्कार, समाज के ऊँचीश्रेणी के लोगों द्वारा निम्न वर्ग के साथ किया गया बलात्कार, सत्ताधारी ताकत , पुलिस, सैन्य बल द्वारा किया गया बलात्कार, आदि।
  2. क्रोध बलात्कार – ऐसा बलात्कार जो क्रोध दिखाने या पीड़िता पर क्रोध की भावनाओं को व्यक्त करने के उद्देश्य से किया जाता है।
  3. दुखद बलात्कार – ऐसी बलात्कार की घटनाएँ जो किसी मानसिक रोग से ग्रस्त वयक्ति द्वारा की जाती है जिसमें बलात्कारी को पीड़िता की पीड़ा से खुशी मिलती है।
  4. यौन बलात्कार – ऐसे बलात्कार की घटना जिसमें बलात्कारी वयक्ति या समूह अपनी यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए किसी महिला का बलात्कार करता है।

इससे यह स्पष्ट है कि बलात्कार सिर्फ़ यौन इच्छा या कामेच्छा नहीं है, जैसा कि आमतौर पर माना जाता है, बलात्कार या यौन हमलों के पीछे हमेशा कोई न कोई उद्देश्य होता है। यौन इच्छा की वजह से किया गया यौन अपराध केवल चार कारणों में से एक है जो किसी व्यक्ति को बलात्कार के लिए उकसा सकता है।

हम बलात्कार की समस्या को यह जाने बिना हल नहीं कर सकते कि यह घटना किन चीजों से ट्रिगर(शुरु) होती है। आमतौर पे बलात्कार को ट्रिगर करने वाले कारक इस प्रकार हैं:

शराब

यह बात आमतौर पर सब जानते हैं कि कई बलात्कार की घटनाएं तब हुई हैं जब हमलावर शराब के नशे में था, शराब यौन अपराधों के सबसे गंभीर ट्रिगर्स में से एक है। यह सबको पता है कि शराब एक व्यक्ति के सामान्य व्यवहार को बदल देता है। शराब के प्रभाव में एक व्यक्ति अकल्पनीय चीजें कर सकता है जो वह सामान्य हालत में नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि शराब मनुष्य के मस्तिष्क की गति, सहज, भावनात्मक, संज्ञानात्मक, और अवधारणात्मक पहलुओं को प्रभावित करके ” असंयम” का कारण बन जाता है। असंयम की स्तिथि में प्रायः तीन प्रकार के व्यवहार देखने को मिलते हैं:

  1. Hyper sexuality – यौन आग्रह में अचानक से वृद्धि
  2. Hyperphagia – भूख या भूख में वृद्धि
  3. Aggression – आक्रामकता

अगर किसी ने “असंयमित व्यवहार के लक्षणों” को पढ़ा है, तो वह शराब और यौन अपराधों के बीच के संबंध को आसानी से समझ सकता है। शराब के प्रभाव में यौन अपराधों के होने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है और इसलिए शराब को बलात्कार एवं अन्य यौन अपराधों के ट्रिगर्स में सबसे बड़ा ट्रिगर्स माना जाता है।

पोर्नोग्राफी और गालियां देनें का चलन

रॉबिन मॉर्गन ने अपने एक प्रमुख वाक्यांश में कहा है कि “पोर्नोग्राफी सिद्धांत है जबकि बलात्कार उसका अभ्यास है” यह वाक्यांश पोर्नोग्राफी और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के बीच स्पष्ट लिंक को दर्शाता है। व्यवहारिक वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि पोर्नोग्राफी एक “ज्वलंत यौन वासना(कल्पना)” के स्रोत के रूप में काम करता है जो पुरुषों को विकृत मानसिकता की स्तिथि में ले जा सकता है और मनुष्य के अंदर कई प्रकार के नकारात्मक समाजिक प्रभाव पैदा करता हैं। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए, आप बहुत सी पुस्तकों को पढ़ सकते है जैसे: “पोर्नोग्राफी के लंबे समय तक उपभोग के प्रभाव” और “वातानुकूलित व्यवहार के रूप में यौन विचलन: एक परिकल्पना”।

हम सभी जानते हैं कि हमारे समाज में गालीयों के चलन में काफी वृद्धि हुई है। टीवी, पत्रिकाओं, फिल्में, सड़क पर होर्डिंग्स, और विज्ञापन भी इससे अछूते नहीं हैं। हर जगह अपशब्दों की लगातार बमबारी से लोगों में खासकर युवाओं का मन प्रदूषित हो जाता है।

पोर्नोग्राफी और गालियों का प्रयोग हमारे सामान्य और स्वस्थ यौन व्यवहार के दृष्टिकोण को बदलने में काफ़ी प्रभावी होता है। जब कामुकता के विकृत और सड़े हुए विचार ही समाज के आदर्श बन जाए, तो हमें इसके अवांछित परिणामों से आश्चर्यचकित भी नहीं होना चाहिए।

महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण

यौन अपराधों के सामाजिक कारकों में से एक महत्वपूर्ण कारक “महिलाओं के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण” भी है। हमारे समाज में आज भी कई लोग महिलाओं को एक कमज़ोर प्राणी और वासना की वस्तु के रूप में देखते हैं। इतना ही नहीं बल्कि कभी कभी यह भी देखने को मिलता है कि, किसी किसी बलात्कार के मामले में उल्टे पीड़िता को ही बलात्कार के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है। यह कह कर बलात्कारी व्यक्ति को बचाने की कोशिश की जाती है कि “अगर महिला ने इस तरह कपड़े नहीं पहने होते या ऐसा नहीं किया होता, तो उसके साथ बलात्कार नहीं किया गया होता”। ये तो वही बात हो गई जैसे कोई यह कहे कि “अगर दुकान के मालिक के पास नकद नहीं होता तो उसे लूटा नहीं जाता”।

दुर्भाग्य से, महिलाओं के लिए इस तरह के अपमानजनक दृष्टिकोण और यौन अपराधों को लेकर संकीर्ण समझ समाज के सभी स्तरों में पाई जाती है। उच्च सामाजिक स्तर के विद्वान पुरुषों को भी महिलाओं और महिलाओं को प्रभावित करने वाले यौन अपराधों के बारे में गैर-जिम्मेदाराना और घृणित बयान देते हुए देखा जाता है और ये काफ़ी चौंकाने वाली बात है। मनोरंजन एवं फिल्म उद्योग ने भी महिलाओं के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण में काफी योगदान दिया है जिसमें विलेन द्वारा रेप कि घटना, लड़कियों का पीछा करना, उनके शरीर को लेकर टिपण्णी करना एवं उन्हें आईटम गर्ल (वासना के वस्तु) के रूप में प्रस्तुत करने जैसे चीजों को आमतौर पे पड़ोसा जाता है ।

हमारे समाज में अभी भी बहुत लोगों कि मानसिकता ऐसी है जो, एक बलात्कार पीड़िता को सहानभूति देने के बजाए उन्हें एक सामाजिक कलंक के रूप में नीचा दिखाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। इस प्रकार के मानसिकता कि वजह से कई पीड़िता, आगे बढ़ कर बलात्कारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने से डरती है, यहाँ तक कि पीड़िता के परिवार वाले भी परिवार के बदनामी के डर से शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं। इससे बलात्कारियों का मनोबल बढ़ जाता है और वह दूसरी बार फिर से ऐसे कुकर्म करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाता हैं। इस बदनामी के डर ने हमारे समाज को इतना प्रभावित किया है कि सरकार ने मीडिया में बलात्कार कि ऐसी रिपोर्टिंग को अवैध करार दिया है जिसमें पीड़िता कि पहचान ज़ाहिर होती हो। बलात्कार कि घटना में पीड़िता को ही दोषी ठहराने और बदनाम करने जैसे असंवेदनशील रवैये को बदलने कि ज़रूरत है। बलात्कार कि घटना में अपराध और शर्म का बोझ केवल हमलावर पर गिरना चाहिए, न कि उलटे पीड़िता पर। महिलाओं के खिलाफ अपराधों की निरंतर वृद्धि को रोकने के लिए हमें महिलाओं के प्रति समाज का उपरोक्त दृष्टिकोण को बदलना होगा।

कानून

हालांकि कानून में बलात्कार को एक अपराध और इसके करने वाले व्यक्ति को अपराधी माना गया है, पर सिर्फ कानून बना देने से बलात्कार कि घटना का समाधान नहीं किया जा सकता है। बलात्कार के निवारक के रूप में कानून का प्रभाव बहुत कम होता है। भारत में बलात्कार की सजा के आंकड़े इस बात को दर्शाते हैं। 1971 में भारत में बलात्कार के कम से कम 41% मामलों में अभियुक्त के खिलाफ दोष सिद्ध होता था। अगर आप इस आंकड़े से निराश है तो यह जानकर आपकी निराशा और बढ़ेगी कि आने वाले समय में बलात्कार के लिए दोषसिद्धि दर और भी कम हो गई जो कि वर्ष 2010 में केवल 26% थी। यह जानकर और भी हैरानी होती है कि दलित महिलाओं के खिलाफ बलात्कार के लिए दोषसिद्धि दर केवल 3% है जिसके लिए सबसे ज्यादा सख्त कानून बनाये गए हैं। बहुत अफसोसनाक बात है कि इस प्रकार के आंकड़ों से बलात्कारियों भीतर अपराध का डर बढ़ने के बजाए उनके मनोबल में अपराध के प्रति और बढ़ावा मिलता है।

कानून का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है “न्याय मिलने में विलम्ब होना, न्याय नहीं मिलने के बराबर है“। अपराधियों के खिलाफ सजा की दर काफी खराब होने के बावजूद, कोर्ट रूम में अत्यधिक धीमी गति से चलने वाले ट्रायल और देर से आने वाले फैसले, स्थिति को और भी ज्यादा गंभीर बना देते है। न्यायालयों के ऐसी स्तिथि के साथ हम बलात्कार के दर में कमी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

परमेश्वर की चेतना की कमी

निसंदेह ये पढ़ कर कई लोग आश्चर्यचकित हो सकते है कि बलात्कार के कारणों में से एक कारण “परमेश्वर की चेतना की कमी” का होना भी है। यह सच है कि यौन अपराध करने वाले व्यक्ति या समूह के भीतर अगर कानून या समाज का भय खत्म हो जाए, तो फिर उसे इस बुरे काम को करने से कोई भी नहीं रोक सकता। उदाहरण के लिए शक्ति बलात्कार पे गौर करें: इस तरह के बलात्कार के अपराधियों को कानून या समाज से डरने की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि वे अपने शक्ति का इस्तेमाल कर बिना दंडित हुए कानून और समाज की नज़रों में रिहा हो जाते हैं और समाज में अन्य लोगों की तरह सामान्य जीवन जीते हैं जैसे कि उनके जीवन पे कोई फर्क पड़ा ही ना हो। अब इस प्रकार के शक्तिशाली व्यक्ति या वर्ग के लोगों को बलात्कार करने से कौन सी ताकत रोक सकती है ? जब तक ये लोग अपने कर्मों के लिए परमेश्वर के प्रति जवाबदेही महसूस नहीं करेंगे, तब तक कोई भी चीज उन्हें बलात्कार जैसा बुरा काम करने से नहीं रोक पाएगी जहाँ अपराध के लिए उनके पास एक खुला अवसर होता है।

पिछले पांच दशकों में, कई विद्वान लोग बलात्कार जैसी जघन्य अपराध और सामाजिक प्लेग को खत्म करने के समाधान को ढूँढने का प्रयास करते आ रहे हैं। सख्त कानून बनाने से लेकर महिलाओं को कराटे सिखाने तक अलग अलग प्रस्तावित समाधान किए गए हैं। जिसके लिए भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व माननीय मुख्य न्यायाधीश स्वर्गीय श्री वर्मा द्वारा ने वर्मा आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

यदि हम प्रस्तावित समाधानों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करें, तो हम देख सकते हैं कि प्रस्तावित समाधान में बलात्कार के मूल कारणों और विभिन्न प्रकार के बलात्कारों से निपटने के तरीकों को अनदेखा किया गया हैं। यहां तक कि वर्मा आयोग की 600 पृष्ठों की रिपोर्ट में भी शराब, पोर्नोग्राफी और गालियों जैसे ट्रिगर्स को समाप्त करने के बारे में कोई बात नहीं की गई है।

हालांकि हम इस बात से सहमत हैं कि बलात्कार को खत्म करने के लिए अब तक किए गए प्रत्येक प्रयास प्रशंसा के योग्य हैं, किन्तु हमें यह भी महसूस करने की जरूरत है कि यदि कोई प्रस्तावित समाधान बलात्कार के मूल कारणों से नहीं निपटता है, तो वह समाधान केवल एक डॉक्टर द्वारा दी गई रोग की दवा के जैसे ही प्रभावी होगा जो बीमारी के मूल कारणों को अनदेखा करके बस कुछ तत्काल राहत देने में प्रभावी होता है।

कोई पूछ सकता है कि “क्या हमारे पास बलात्कार को रोकने के लिए कोई पूर्ण समाधान है? हाँ है! इस्लाम बलात्कार को मिटाने का पूर्ण समाधान देता है। आप सोच सकते हैं कि “इस्लाम तो केवल एक धर्म है, इसका बलात्कार के समाधान के साथ क्या लेना-देना है? इसका जवाब है: इस्लाम सिर्फ एक धर्म ही नहीं है बल्कि जीवन जीने का एक तरीका, जो ईश्वर द्वारा पूरी मानवता को दिया गया है और जीवन के इस तरीके में बलात्कार सहित मनुष्य के सभी समस्याओं के समाधान मौजूद हैं। हम आपको संक्षेप में इस्लाम की मूल बातों को बताना चाहेंगे।

इस्लाम क्या है?

इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है जिसे पैगंबर मुहम्मद(उन पर शांति हो) ने 1400 वर्ष पहले स्थापित किया है। इस्लाम एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है पूर्ण आज्ञाकारिता और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (संस्कृत और कन्नड़ में इसे ‘शरणागति’ कहते हैं)। यह वही धर्म (जीवन का तरीका) है – जिसे ईश्वर ने पृथ्वी पर आए पहले इंसान आदम को दिया था। और उसके बाद आने वाले ईश्वर के सभी पैगंबर(भविष्यद्वक्ताओं) और महा ऋषियों ने भी जीवन का यही एक तरीका सिखाया। पैगंबर मुहम्मद ईश्वर के अंतिम पैगंबर हैं जिन्होंने ईश्वर द्वारा निर्धारित किए गए जीवन के उसी तरीके को आज से 1400 साल पहले पुनर्जीवित किया था।

मुसलमान कौन है?

जो कोई भी ईश्वर का पालन करता है और ईश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता का ध्यान रखते हुए जीवन गुज़ारता है, उसे अरबी में मुस्लिम कहा जाता है। एक व्यक्ति अपने नाम के कारण या किसी मुस्लिम परिवार में पैदा होने के कारण मुस्लिम नहीं बन जाता है। यदि आप ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं और सिर्फ एक ईश्वर की पूजा करते हैं, तो आपको भी अरबी में मुस्लिम कहा जाएगा।

अल्लाह कौन है?

अल्लाह सिर्फ मुस्लिम समुदाय का ईश्वर नहीं है। “अल्लाह” एक अरबी शब्द है जो हिंदी भाषा के “ईश्वर” अर्थ के लिए प्रोयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए: पानी को अंग्रेजी में वाटर कहते है। हिंदी में पानी या जल, कन्नड़ में नीरू और अरबी में मोया कहते है। इसी तरह, ईश्वर को अंग्रेजी में गाँड कहते है, हिंदी में ईश्वर,कन्नड़ में देवारू और अरबी में अल्लाह कहते है।

कुछ लोग ये पूछ सकते हैं कि “एक विवेकशील और बुद्धिमान प्राणि होने के नाते, क्या मनुष्य अपने लिए सही और गलत खुद तय क्यों नहीं सकता और अपनी समस्याओं के समाधान खुद क्यों नहीं हल सकता है? बलात्कार जैसे मामलों के समाधान के लिए हमें परमेश्वर पर क्यों निर्भर रहना चाहिए? यह एक बहुत ही सही प्रश्न है। आइए हम इस बारे में सोचें।

केवल परमेश्वर ही हमें पूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है

हम जानते है कि किसी भी मशीन या प्रोडक्ट के बारे में सबसे ज्यादा ज्ञान उसी व्यक्ति या कंपनी को होगा जिसने उसे बनाया है जो उसका निर्माता है। उदाहरण के लिए; किसी मोटर कार को ले लें, अगर हमें कार में स्पेयर पार्ट्स लगाना हो तो हम उसी कंपनी के स्पेयर पार्ट्स लगाना पसंद करते है जिस कंपनी ने खुद वो कार बनाई है, ऐसा इसलिए कि हम ये मानते हैं कि समान कंपनी के स्पेयर पार्ट्स सबसे अच्छा काम करते हैं क्यों कि हमें विश्वास है कि वाहन निर्माता ही वाहन के बारे में बेहतर जानता है कि वाहन के लिए सबसे अच्छा क्या है क्या नहीं, या अन्य कंपनी के पार्ट्स को इस्तेमाल करने से वाहन में गडबड़ी आ सकती है।

यहाँ क्या कोई ऐसा कह सकता है कि ये हमारा वाहन है, हम इसके मालिक हैं और क्यों न हम जैसे चाहें इसका उपयोग करें? क्या कोई ऐसे कहेगा कि मैं अपने मूड के हिसाब से पहियों में हवा के दबाव को बदल दूँगा या मुझे जो सही लगेगा मैं वही आयल इंजन में डालूँगा? बिल्कुल नहीं और अगर कोई ऐसा कहता है तो हम उसे मुर्ख कहेंगे।

ये बात काफी आश्चर्यचकित करती है कि जब हम स्पेयर पार्ट्स जैसी साधारण चीज (यहाँ तक कि पहिये में हवा का दबाव) तक के लिए उसके निर्माता पर विश्वाश करते है, उसके बताए गए अनुदेश का पालन करते है तो फिर मनुष्य खुद अपने मामलें में अपने निर्माता के अनुदेश कि तरफ़ देखना पसंद क्यों नहीं करता?

जब मानव निर्मित उत्पादों के साथ हमारा ऐसा मामला है, तो मनुष्यों जैसे जटिल प्राणी के बारे में आपकी क्या राय है?

यदि हम मनुष्यों को एक मशीन के रूप में देखें, तो हम अपनी भावनाओं और सोचने की क्षमता कि बुनियाद पे पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे जटिल मशीन हैं। हमारा निर्माता होने के नाते परमेश्वर, हमसे बेहतर जानते है कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। उसने हमारे लिए जीवन जीने का एक तरीका निर्धारित किया है जो हमें परमेश्वर के दूतों द्वारा एवं उनके द्वारा प्रकट शास्त्रों में बताया गया है। परमेश्वर के बताए गए मार्गदर्शन से भटक जाने के परिणामस्वरूप, पृथ्वी पे अराजकता और विनाश की स्तिथि ही पैदा होगी और यही वह स्तिथि है जिसे हम आज अनुभव कर रहे हैं।

इस्लाम द्वारा प्रस्तावित समाधान बलात्कार एवं अन्य यौन अपराधों पे नियंत्रण के साथ साथ इसके सभी मूल कारणों को भी संबोधित करता है। यही कारण है कि इसे हम सबसे अच्छा समाधान कह सकते है। यदि इस समाधान को दुनिया भर में अपनाया जाए, तो यह इस्लामिक समाधान बलात्कार जैसे भयानक अपराधों को गहन तरीके से कम करेगा। जैसा कि आप नीचे देखेंगे, बलात्कार के लिए इस्लाम का समाधान बलात्कार के साथ साथ इसके सभी ट्रिगर्स को भी समाप्त करने की बात करता है।

1. शराब का निषेध

परमेश्वर कुरान के अध्याय 5 में शराब को निषिद्ध करार देते हैं: अध्याय 5 के आयत 90 में बताया गया है:

ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, यह नशीले पदार्थ (शराब) और जुआ और यह आस्ताने और पांसा फेंकना, ये सब गंदे शैतानी काम हैं इनसे परहेज़ करो, आशा है कि तुम सफल हो जाओगे

अध्याय 5 के आयत 90

पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

शराब सभी बुराइयों की कुंजी है।

Hadith

किसी भी राज्य या देश में शराब के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए जहां ईश्वर का धर्म स्थापित किया गया हो।

2. अपशब्द और अश्लीलता का निषेध

परमेश्वर सभी बेशर्मी वाले क्र्त्यों को निषिद्ध करार देते है और इस्लाम में अपवित्रता एवं अश्लीलता के लिए कोई स्थान नहीं है। पोर्नोग्राफी देखना या किसी भी बेशर्मी वाले एवं गन्दे कृत्य का हिस्सा बनना, जो या तो देखने, सुनने या बोलने के लिए प्रोयोग हो, उसे इस्लाम में सख्ती से मना किया गया है।

ईश्वर कुरान में कहते हैं,

निस्संदेह अल्लाह तुम्हें न्याय और एहसान (अच्छे आचरण) का आदेश देता है और रिश्तेदारों से अच्छे सलूक करने का हुक्म देता है और वह तुम्हे अनैतिकता, बुरे आचरण एवं उत्पीड़न से मना करता है

अध्याय 16: आयत 90:

3. महिलाओं के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण

इस्लाम मानवता को महिलाओं को उसका हक देना एवं उनका सम्मान करना सिखाता है। इस्लाम के कई ऐसे आलोचक हैं जो दावा करते हैं कि इस्लाम में महिलाओं पर अत्याचार किया जाता है। जबकि सच्चाई बिल्कुल इसके विपरीत है, कुरान और पैगंबर मुहम्मद (उस पर शांति हो) की शिक्षाओं को सावधानीपूर्वक पढ़ने से पता चलता है कि इस्लाम ने महिलाओं को कई तरह के सामाजिक बेड़ियों एवं शोषण से मुक्त किया है और उन्हें कई ऐसे अधिकार दिए जिनके बारे में 14 वीं शताब्दी से पहले कभी सोचा भी नहीं गया था।

महिलाओं के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण कि शुरुआत महिला बच्चों के लिए माता-पिता की नापसंदगी के साथ शुरू होता है।

कुरान में अल्लाह उन लोगों को खुली चेतावनी देते हैं, जो महिला बच्चों (बेटियों) को नापसंद करते हैं। परमेश्वर कुरान कि अध्याय 16 कि आयत 58 और 59 में कहते है:

और जब उनमें से किसी को बेटी के जन्म कि खुशखबरी दी जाती है, तो उसके चेहरे पे अँधेरा छा जाता है, और वह बस खून का घोंट सा पीकर रह जाता है। लोगों से छुपता फिरता है कि, इस खबर के बाद किसी को क्या मुंह दिखाए, सोचता है कि इस अपमान के साथ क्या बेटी को रखना चाहिए या इसे जमीन में दफन कर देना चाहिए? याद रखों, निसंदेह बहुत बुरा है, वह फैसला जो ये लोग तय करते हैं

कुरान कि अध्याय 16 कि आयत 58 और 59

कुरान में ईश्वर ने बताया है कि पुरुष और महिलाएं दोनों एक दुसरे के लिए प्रशंसा और सुरक्षा के पूरक हैं। ईश्वर कहते है:

वे तुम्हारे लिए कपड़े हैं और तुम उनके लिए कपड़े हो।

कुरान अध्याय 2: पद 187

यहाँ तक कि परमेश्वर पुरुषों और स्त्रियों की जिम्मेदारियों और कार्यों के बारे में भी समान रूप से बात करते है। ईश्वर कहते है:

मैं तुम लोगों में से किसी के भी कार्य को बर्बाद करने वाला नहीं हूँ, चाहे वह पुरुष हो या महिला; तुम सब एक दूसरे के जैसे हो

कुरान अध्याय 3: पद 195

महिलाओं के अधिकारों के बारे में, पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा:

स्त्रियों के विषय में परमेश्वर से डरो। आपके पास उन पर अधिकार हैं, और उन्हें आप पर अधिकार मिला है

Hadith

पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने घोषणा की:

तुम लोगों में से सबसे अच्छा पुरुष वह हैं जो अपनी महिलाओं के साथ सबसे अच्छा व्यवहार करता हैं

Hadith

4. इस्लाम ने जो कानून बनाए वह पुरुषों और महिलाओं की प्रकृति के अनुरूप हैं

इस्लाम में विभिन्न लिंगों के अनुरूप नियमों और कानूनों को लागू करने के सिद्धांत को अच्छी तरह से जगह दिया गया है। उदाहरण: हम कभी भी 100 मीटर की दौड़ में एक महिला एथलीट का एक पुरुष एथलीट के साथ मुकाबला की मांग या उम्मीद नहीं करते हैं। यही सिद्धांत अन्य खेलों में भी देखा जा सकता है जिसमें शारीरिक गतिविधियां शामिल हैं जैसे क्रिकेट,फूटबाल, आदि । हम में से कोई भी इसे असमानता या लिंगों के आधार पर भेदभाव नहीं कहता है क्योंकि हम पुरुषों और महिलाओं की शारीरिक प्रकृति में अंतर को समझते हैं।

दुर्भाग्य से, महिला स्वतंत्रता एवं उन्हें समानता प्रदान करने के नाम पर, कई आधुनिक समाजों ने समाजिक ताना बाना में बदलाव करके और ऐसे ऐसे कानूनों को लागू करके एक लापरवाह रवैया दिखाया है जिसमें पुरुषों और महिलाओं की प्रकृति में अंतर को ध्यान में रखा ही नहीं गया। इसके उल्ट इन प्रोयोगों से यौन अपराधों में वृद्धि, टूटे हुए परिवार, गर्भपात, वैवाहिक बेवफाई आदि जैसे गंभीर परिणाम सामने आ गए हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2004 में “महिलाओं के खिलाफ हिंसा बंद करो” नामक एक रिपोर्ट में कहा था कि उस वर्ष के दौरान हर 90 सेकंड में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता था। संगठन RAINN (बलात्कार, दुर्व्यवहार और अनाचार राष्ट्रीय नेटवर्क), जो यौन उत्पीड़न के खिलाफ सबसे बड़ा अमेरिकी राष्ट्रीय संगठन है के अनुसार, हर दो मिनट में अमेरिका में एक यौन हमला होता है, जिसका अर्थ है कि एक वर्ष में यौन हमलों की संख्या 2,07,754 है।

इस्लाम ने जो कानून बनाए वह पुरुषों और महिलाओं की प्रकृति के अनुरूप हैं। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है, जबकि इस्लाम पुरुषों और महिलाओं के साथ समान व्यवहार कि बात करता है, इसके बावजूद भी किसी किसी पहलुओं पे उन्हें समान नहीं माना गया है ऐसा इसलिए क्यूंकि पुरुष और महिलाएं शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से अलग-अलग होते हैं। इसलिए, प्रसिद्ध लेखक जॉन ग्रे ने लिखा है कि “पुरुष मंगल ग्रह से हैं, महिलाएं शुक्र से हैं”।

परमेश्वर कहते है:

और नर मादा की तरह नहीं है

कुरान में अध्याय 3 के आयत 36

उन पहलुओं में जहां पुरुष और महिलाएं दोनों समान हैं, इस्लाम समान कानूनों को स्थापित करके उन्हें समान अधिकार देता है जबकि उन पहलुओं में जहां पुरुष और महिलाएं अलग-अलग हैं, इस्लाम ने ऐसे कानूनों की स्थापना की है जो पुरुषों और महिलाओं की प्रकृति के अनुरूप हैं जो एक संतुलित एवं स्वस्थ समाज के लिए जरूरी हैं।

5.  पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए सख्त नैतिक कोड

इस्लाम पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए सख्त नैतिक संहिताएं निर्धारित करता है और उनमें से प्रत्येक को अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए खुद जिम्मेदार रहने को कहा है। अल्लाह ने कुरान में कहा है,

विश्वासी पुरुषों से कहो कि वे अपनी नज़रें नीचे रखा करें और अपने विशेष अंगों की हिफाज़त करें (व्यभिचार और बलात्कार करने से)। यह उनके लिए ज्यादा पवित्र तरीका है। निस्संदेह अल्लाह भली-भाँति जानता है कि वे क्या कर रहे हैं

कुरान अध्याय 24: पद 30.

और ईमान वाली स्त्रियों से कहो कि वे अपनी नज़रें नीचे रखा करें और अपने विशेष अंगों की हिफाज़त करें और अपने शृंगार को न दिखाएँ, सिवाय इसके कि जो कुछ स्वतः दिख जाती है, और अपने सीनों पे ऊढ़नियों का आँचल डाले रहें, अपने शृंगार को अपने पति, पिता, पति के पिता, अपने बच्चे, सौतेले बच्चे, भाई और उनके बच्चे, बहनों के बच्चे , अपने मेल जोल की सहेलियां, अपने मिलकियत के वो पुरुष परिचारक जिनके पास कोई शारीरिक इच्छा नहीं हो या बच्चे जो अभी तक महिलाओं के निजी पहलुओं से अवगत नहीं हैं के सिवा किसी और के सामने उजागर न करें।

अध्याय 24: पद 31.

जैसा कि आप ऊपर दिए गए छंदों में देख सकते हैं, परमेश्वर महिलाओं को निर्देश देने से पहले पुरुषों को चेतावनी देते है। कई लोगों का मानना है कि इस्लाम में केवल महिलाओं के लिए ड्रेस कोड है, पुरुषों के लिए नहीं। परमेश्वर पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित करते है और दोनों को सादगी एवं विनम्रता के साथ कपड़े पहनने का आदेश दिया गया है।

पुरुषों और महिलाओं के लिए ड्रेस कोड:

परमेश्वर पुरुषों और महिलाओं दोनों को इस तरह के कपड़े पहनने का आदेश देते है जो इस तरह है:

  1. वस्त्र मामूली होनी चाहिए, अश्लील या अभद्र नहीं होनी चाहिए।
  2. वस्त्र ढीली होनी चाहिए ज्यादा तंग फिटिंग नहीं होनी चाहिए जिससे की शरीर के अंग की बनावट ज़ाहिर हो!
  3. वस्त्र इतना पारदर्शी नहीं होनी चाहिए कि शरीर के अंदरूनी अंग दिखे!
  4. वस्त्र ऐसा नहीं होनी चाहिए कि शरीर के सम्मानित अंगों को कवर ना कर पाए!

ऊपर उल्लेखित पहले तीन बिंदु पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान हैं, जबकि बिंदु 4 पुरुषों और महिलाओं के लिए उनके शारीरिक प्रकृति के अनुरूप अलग अलग है। पुरष और महिला के शारीरिक एवं भावनात्मक प्रकृति के अंतर को देखते हुए उनके लिए शरीर की सीमा जिसे कवर करने की आवश्यकता होती है अलग अलग निर्धारित की गई है। एक पुरुष के लिए नाभि से घुटनों तक कवर करना अनिवार्य किया गया है, जबकि एक महिला को निर्देश दिया जाता है कि वह अपने हाथों और चेहरे को छोड़कर अपने पूरे शरीर को अनिवार्य रूप से कवर करे।

महिलाओं के लिए इस्लामी ड्रेस कोड (हिजाब) को कुछ लोग सिर्फ इस बिना पे नापसंद करते हैँ क्यों कि उनका मानना है कि:

  • हिजाब महिलाओं के उत्पीड़न और गिरावट का प्रतीक है।
  • यह इस्लामी ड्रेस कोड महिलाओं की प्रगति को रोकता है।
  • यह ड्रेस कोड पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर को बढ़ावा देता है।

आप हिजाब के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ सकते हैं <link>

क्या सभी पुरुष बुरे हैं?

कुछ लोगों का यह तर्क होता हैं कि, महिलाएं जिस तरह से चाहे, उसे उस तरह से कपड़े पहनने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए क्योंकि सभी पुरुष बुरे नहीं होते हैं और ऐसा नहीं है कि “उदारतापूर्वक” कपड़े पहनने वाली सभी महिलाओं के साथ बलात्कार कि घटना होती है। यह बिल्कुल सच है कि, सभी पुरुष बुरे नहीं हैं। पर ये भी सत्य है कि जब पुरुष कि नज़र किसी महिला पे पड़ती है तो, बहुत से ऐसे लोग होते है जो अपनी नज़रें नीचे कर लेते हैं, कुछ लोगों की नज़रें बार बार महिला के अंगों पे जाती है, उनमें से कुछ लोग नज़रों से परे जाकर कल्पना करना शुरू कर देते हैं। वहीँ कुछ लोग कुछ भद्दी टिप्पणियां पारित करने से खुद को नहीं रोक पाते हैं। यहाँ तक की कुछ लोग महिला का पीछा करना शुरू कर देते है और उससे आगे बढ़कर अगर उन्हें मौका मिल जाए तो मौके का फ़ायदा उठाकर वो कुछ छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटना से भी परहेज़ नहीं करते। यह बातें कुछ उन पुरुषों के बारे में है जिनके बारे में हमारा समाज चिंतित हैं। हालाँकि जब एक महिला एक पुरुष को देखती है तो उसके अंदर ऐसे विचार नहीं आते यही वजह है की हमें कभी ये सुनने को नहीं मिलता के किसी महिला ने किसी पुरुष का बलात्कार किया हो।

उदाहरण के लिए: जब हम शहर से बाहर जाते हैं तो हम अपने घरों को ताले लगाकर बंद कर देते हैं। हम ऐसा क्यों करते हैं? क्या ऐसा इसलिए है कि हमें यह लगता है कि हमारे सभी पड़ोसी और हमारे सड़कों पर चलने वाले सभी लोग चोर हैं? हम सभी जानते हैं कि अधिकांश लोग अच्छे हैं और लुटेरे बहुत कम हैं, फिर भी हम उन कुछ लुटेरों से रक्षा के लिए अपने घरों को ताले से बंद कर देते हैं। एक ऐसे व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय होगी जो जो यह कहता हो कि ” कुछ लुटेरों के वजह से मैं अपने घर पे ताले पर पैसे खर्च क्यों करूँ? सिर्फ इसलिए कि मेरा घर खुला है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई इसे लूट सकता हैं?” क्या आप इसे एक समझदार तर्क कहेंगे? यदि नहीं, तो इसी तरह कुछ लफंगे एवं अमर्यादित पुरुषों की वासनापूर्ण नज़रें, नीच आंखें और बदनियति से अपने सम्मान की रक्षा के लिए अगर कोई महिला एक साधारण और सभ्य पोशाक पहनती हैं तो इससे महिला स्वतंत्रता कैसे प्रभावित होती है?

हम आपको आश्वस्त करते हैं कि इस्लाम में हिजाब का दायित्व इसलिए नहीं है कि इस्लाम में हर उस महिला को अनैतिक समझा जाता है जो हिजाब नहीं पहनती है, या इस्लाम सभी पुरुषों को बुरा ही मानता है जो सिर्फ अपनी दुष्टता और इच्छाओं के लिए महिलाओं पे ध्यान केंद्रित करते हैं। बल्की, इस्लाम समाज में अधिकांश सभ्य लोगों के उपस्तिथि के बावजूद भी, इस बात कि ज्यादा चिंता करता है कि इसी समाज में दुष्ट लोगों का भी एक छोटा सा प्रतिशत है और निसंदेह ऐसे लोगों से ही महिलाओं को सुरक्षित करने की ज़रूरत है। इस मुट्ठी भर दुष्ट लोगों के बुरे कृत्यों से सभ्य लोगों के सम्मान की रक्षा हेतु, इस्लाम ने हमारे समाजिक जीवन में कुछ नैतिक दिशानिर्देश लागू किए हैं जो यौन अपराधों की इन अवांछनीय घटनाओं को काफी कम कर देता है।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने 5 मार्च 1927 को पुणे में एक सार्वजनिक बैठक में कहा था:

मुझे किसी भी महिला, यहां तक कि मेरी पत्नी के लिए ये आपत्ति नहीं है कि, वो पत्थरों को तोड़ने और शौचालयों की सफाई करने का काम करे; लेकिन मैं निश्चित रूप से चाहता हूं कि कोई भी मेरी बहन या मां पर वासनापूर्ण आंखें न डाले

5 मार्च 1927 को पुणे में एक सार्वजनिक बैठक में कहा

6. एक औरत का किसी ऐसे पुरुष (जो उसके करीबी रिश्तेदार भी नहीं है) के साथ अकेले रहने कि मनाही

इस्लाम एक महिला को उन पुरुषों के साथ अकेले रहने से मना करता है जो उसके पिता, भाई, चाचा, पति आदि जैसे करीबी रिश्तेदार नहीं हैं। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

जब भी कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ अकेला होता है (जो उससे संबंधित ना हो या उससे विवाह नहीं किया हो) तो शैतान (इब्लीस) उनके बीच तीसरा होता है

Hadith

संगठन RAINN (बलात्कार, दुर्व्यवहार और अनाचार राष्ट्रीय नेटवर्क) के अनुसार, लगभग 2/3 बलात्कार के मामले ऐसे है जिसमे घटना को अंजाम देने वाला व्यक्ति पीड़िता के जान पहचान का पाया गया। यदि इन मामलों में प्रत्येक महिला, ईश्वर के इस मार्गदर्शन का ख्याल रखते हुए, ऐसे आदमी (जिसे भले ही वह अच्छी तरह से जानती हो) के साथ अकेले रहने से परहेज़ करती, तो शायद आज इस तरह के बलात्कारों कि संख्या काफी कम होती।

यौन उत्पीड़न स्कूलों से लेकर अदालतों तक हर जगह होता है। इस बुराई से कोई भी कार्यालय या कोई भी उद्योग अछूता नहीं है। इसलिए, आए दिन हमें कहीं न कहीं से सहकर्मियों, वरिष्ठ अधिकारियों, शिक्षकों और यहां तक कि न्यायाधीशों द्वारा भी यौन उत्पीड़न के बारे में पढ़ने और सुनने को मिलता हैं।

पुरस्कार विजेता अमेरिकी डॉक्युमेंट्री “द इनविजिबल वॉर” (इसे ऑस्कर के लिए भी नामांकित किया गया था) में अमेरिकी सेना में मौजूद यौन उत्पीड़न एवं बलात्कार के हैवानों का खुलासा किया गया है। इस डॉक्युमेंट्री का अनुमान है कि अमेरिकी सेना में यौन उत्पीड़न और बलात्कार के घटनाओं की कुल संख्या सिर्फ वर्ष 2010 में 19,000 थीं। जबकि इस सन्दर्भ में रक्षा विभाग ने केवल 3,198 मामलों में ही मुकदमा चलाया जिसमें सिर्फ 244 आरोपियों के खिलाफ़ ही दोष सिद्ध हो पाया । यहां तक कि प्रतिष्ठित रेजिमेंट “मरीन बैरक”, जो ‘व्हाइट हाउस’ की रक्षा करती है, वह भी बलात्कार की इस बुराई से अछूता नहीं रहा ।

ऐसे शक्तिशाली सैन्य महिलाएं जिन्हें आत्म-युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया गया है, यदि उनकी दुर्दशा इतना विभत्स्य है, तो फिर आमतौर पर स्कूलों और अन्य कार्यस्थलों में कार्यरत साधारण महिलाओं की स्थिति की क्या कल्पना की जा सकती है? इस्लाम महिलाओं और पुरुषों के अनावश्यक मिश्रण को प्रतिबंधित करके भी बलात्कार के मसले को निपटता है चाहे वह स्कूल हो या कोई कार्यस्थल, इस बात का ध्यान देना चाहिए कि अनावश्यक प्रकार के ऐसे अवसरों को कम करना चाहिए जहाँ महिला और पुरुष का गैर ज़रूरी मिश्रण हो जो छेड़छाड़ और बलात्कार का कारण बन सकते हैं।

7. ईश्वर की चेतना और ईश्वर के प्रति जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित करना

इस्लाम हमारे अंदर ईश्वर की चेतना पैदा करने की कोशिश करता है, इस्लाम में हमें यह सिखाया जाता है कि हम में से प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो मर्द हो या औरत इस दुनिया में अपने किए गए कार्यों के लिए ईश्वर के समक्ष जवाबदेह है। इस्लाम सिखाता है कि निसंदेह एक दिन दुनिया का अंत हो जाएगा और पहले मनुष्य से लेकर आखिरी मनुष्य तक सभी को क़यामत के दिन पुनः जीवित किया जाएगा और फिर उनके कर्मों के लिए उनसे पूछताछ की जाएगी। परमेश्वर हमारे अच्छे कर्मों को हमारे बुरे कर्मों की तुलना में तौलेंगे, और तदनुसार हम पर अपना न्याय घोषित करेगें। यहाँ तक कि क़ियामत के दिन हमारे छोटे से छोटे कर्मों (चाहे वो गुनाह हो या नेकी) को भी ध्यान में रखा जाएगा। आप “मृत्यु के बाद जीवन” के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ सकते हैं.

केवल परमेश्वर के प्रति जवाबदेही का भय एक व्यक्ति को हर समय इस तरह के जघन्य अपराध करने से रोक सकता है, भले ही स्थिति उनके पक्ष में क्यों न हो। अगर सैन्य पुरुषों, पुलिस और दंगों के दौरान उत्पात मचाते दंगाई को भगवान के प्रति जवाबदेही का डर हो जाए, तो क्या वे इस जघन्य अपराध को करने की हिम्मत करेंगे? परमेश्वर के प्रति जवाबदेही का भय उन्हें यह एहसास कराएगा कि यद्यपि वे इस संसार में अपने बुरे कार्य से बच सकते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके इस जघन्य कार्य को देख रहा है एवं उसके मन में आए बुरे विचार से अवगत है और वह क़ियामत के दिन उन्हें इस कृत्य के लिए दण्डित करेगा। ऐसे पुरुष से ये अपेक्षा की जा सकती है की अनुकूल परिस्तिथि होने के बावजूद भी ऐसे लोग बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य से बच सकते है। केवल परमेश्वर की चेतना ही किसी व्यक्ति को पूरी तरह से सुधार सकती है और उसे शक्ति के बुनियाद पे बलात्कार करने से रोक सकती है।

8. कठोर सजा

ऊपर बताए गए सभी समाधानों के लागू किए जाने के बावजूद भी अगर कोई व्यक्ति बलात्कार जैसे बुरी हरकत करने की हिम्मत करता है तो इस्लामिक कानून बलात्कारी को मौत की सजा देता है। इस्लाम अदालत में इस तरह के मुकदमों को बहुत तेजी से निपटाने का आदेश देता है, जहाँ यह सुनिश्चित किया जाता है कि अपराध साबित होते ही अपराधी के खिलाफ़ निर्णय सुनाया जाए और बिना देर किए उसकी सजा का निष्पादन किया जाए। ऐसे मामलों में समाज के लोगों को मौत की सजा देखने को मिलती है। यह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की दृष्टि में बलात्कार की गंभीरता को दर्शाता है।

एक सभ्य समाज मौत की सजा की अनुमति कैसे दे सकता है?

कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि मौत की सजा बर्बर है और कई ऐसे लोग हैं जो मौत की सजा को समाप्त करने की मांग करते हैं। मौत की सजा की आवश्यकता को जानने के लिए, हमें सजा के उद्देश्यों को समझने की ज़रूरत है। हम सभी जानते हैं कि कोई भी सजा बलात्कार पीड़िता की पीड़ा को कम नहीं कर सकती। फिर भी हम बलात्कारी को दंडित क्यों करते हैं? कोई भी सजा तीन मुख्य कारणों से सुनाई जाती है:

  1. ताकि बलात्कारी को फिर से बलात्कार करने से रोका जाए
  2. आम लोगों को इस संगीन अपराध के लिए बुरे और विभत्स्य परिणाम देखने को मिले ताकि भविष्य में कोई बलात्कार में शामिल होने से पहले खुद को रोक लें
  3. पीड़िता को यह महसूस होना चाहिए कि उसने बलात्कारी से प्रतिशोध ले लिया और उसे न्याय प्रदान किया गया।

आइए देखें कि क्या मौत की सजा (बलात्कार के लिए इस्लामी सजा) उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करती है।

बलात्कारी को फिर से बलात्कार करने से रोका जाए – मौत की सजा से ये उद्देश्य पूरा हो जाता है क्योंकि वह बलात्कारी फिर से बलात्कार करने के लिए जीवित नहीं रहेगा।

आम लोगों को इस संगीन अपराध के लिए बुरे और विभत्स्य परिणाम देखने को मिले ताकि भविष्य में कोई बलात्कार में शामिल होने से पहले खुद को रोक लें – यह उद्देश्य सजा की गंभीरता, उसके ट्रायल की गति और निष्पादन के तरीके के रूप में भी पूरा किया जाता है, ये पूरी प्रक्रिया निश्चित रूप से आम लोगों के भीतर बलात्कार के सजा के प्रति डर बैठाने के लिए काफी कारगर होगा।

पीड़िता को यह महसूस होना चाहिए कि उसने बलात्कारी से प्रतिशोध ले लिया और उसे न्याय प्रदान किया गया। – यह उद्देश्य भी निश्चित रूप से पूरा होता है क्योंकि पीड़ित अपने बलात्कारियों के लिए कम से कम मौत की सजा तो जरूर मांगते हैं और शायद इससे कम सजा में उनकी आत्मा को संतुष्टि भी नहीं मिलती है। उदाहरण के लिए : मुंबई की एक पत्रकार बलात्कार पीड़िता और निर्भया (दिल्ली बलात्कार पीड़िता) के माता-पिता को देख लें।

निर्भया के पिता ने की आरोपियों को मौत की सजा देने की मांग की

बलात्कार के लिए अन्य सजाओं के बारे में क्या?

काफी आश्चर्यजनक है कि क्या बलात्कार के लिए मौत की सजा के अलावा सजा के अन्य रूप ऊपर उल्लिखित उद्देश्यों को पूरा करते हैं। निश्चित रूप से, आजीवन कारावास लोगों को अपराध करने से नहीं रोक पाता है और इससे पीड़ितों के भीतर एक असंतुष्टि की भावना भी रह जाती है। भगवान न करे, अगर बलात्कार पीड़ित आप या आपकी मां या बहन या पत्नी हो, तो क्या आप स्वीकार करेंगे कि सरकार आपके टैक्स के पैसे से बलात्कारी को दिन में तीन बार खिलाएं, उसे मुफ्त चिकित्सा उपचार प्रदान करें और सप्ताह में एक फिल्म के साथ उसका मनोरंजन करें? यदि आपका जवाब नहीं है, तो आप को पता होना चाहिए की एक बलात्कारी के साथ जेल में यही होता है जिन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है।

परमेश्वर, जिसके पास अपनी रचनाओं के बारे में अनंत ज्ञान है, उन्होंने हमें निर्धारित नियम और एक संतुलित दिशानिर्देश दिए हैं जिसमें हमें बलात्कार सहित मानवजाति द्वारा सामना की जाने वाली सभी समस्याओं का समाधान मिलता हैं। बलात्कार की समस्या का इस्लामी समाधान काफी व्यावहारिक है और काफी प्रभावी परिणाम देता है। आप इस्लाम द्वारा प्रस्तावित समाधान से असहमत हो सकते हैं और ऐसा करना आपका विशेषाधिकार है। पर हम आपसे बस इतना पूछते हैं, क्या आपके पास एक वैकल्पिक समाधान है जो इससे बेहतर, और व्यावहारिक हो और जो समाज को एक प्रभावी परिणाम दे पाए?

जिस क्षण हमारे आस पास एक भयानक और विभत्स्य बलात्कार की घटना होती है, हम बलात्कारियों को मौत की सजा देने के लिए उठते कई आवाजें सुन सकते हैं। इस्लाम में भी बलात्कारियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है लेकिन दोनों के बीच गधे और घोड़े का सा अंतर है। इस्लाम में बलात्कार के लिए सभी दरवाजे बंद करने के पश्चात बलात्कारियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है, जबकि दूसरी ओर बलात्कारियों के लिए मौत की सजा की आवाज़, वह लोग उठाते हैं जो ऐसे समाज में रहते हैं, जहाँ बलात्कार के मूल कारणों पर आंख मूंदकर बलात्कार के सभी दरवाजों को खोल दिए गए हैं। कौन सा समाधान अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत है? आप न्यायाधीश बनकर खुद सोचें।

स्वराज (स्वतंत्रता) का क्या अर्थ है, जबकि एक अकेली महिला भुखमरी से मर रही हो, जबकि उसके सम्मान को किसी भी आम आदमी द्वारा लूटा जा रहा हो?

महात्मा गांधीजी

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