क्या मौत के बाद जीवन संभव है?

क्या इस दुनिया में न्याय पूरी तरह से स्थापित हो सकता है? हिटलर ने साठ लाख बेगुनाह लोगों को मार डाला। मानव कानून हिटलर को क्या सजा दे सकता था? वे जितना अधिक कर सकते हैं, उसे मृत्युदंड देना है। यह केवल एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की सजा होगी। बाकी का क्या?

इस प्रश्न का जवाब ढूँढने से पहले हमें ये पूछना चाहिए है कि क्या हमें मौत के बाद जीवन की ज़रुरत है भी या नहीं ?

क्या हमें मौत के बाद जीवन की ज़रुरत है?

न्याय इस दुनिया में रहने वाले हर मनुष्य की एक बुनियादी जरूरत है चाहे वो किसी भी देश का हो, किसी भी धर्म को मानने वाला हो या किसी भी नस्ल का हो.

यही कारण है कि प्रत्येक देश में न्याय स्थापित करने की एक उच्चतम व्यवस्था की जाती है। उदाहरण के लिए: पुलिस बल, सेना, अदालतें आदि।

क्या इस दुनिया में न्याय पूरी तरह से स्थापित किया जा सकता है?

अब जब हमें ये स्पष्ट हो गया है की न्याय हमारी बुनियादी ज़रुरत है तो दूसरा सवाल ये है कि क्या इस दुनिया में न्याय को पूरी तरह से स्थापित करना संभव है ?

हिटलर ने अपने आतंकित शासनकाल में 60 लाख निर्दोष लोगों को मार डाला था। मान लें अगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया होता, तो दुनिया के कानून के मुताबिक हिटलर को ज्यादा से ज्यादा क्या सजा हो सकती थी? अधिक से अधिक उसे मौत की सजा दे सकते थे। पर यह तो केवल एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या के बराबर की सजा होगी। बाकी पचास लाख, नौ सौ निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे, लोगों के बारे में आपकी क्या राय है?

एक आत्मघाती हमलावर के लिए इस दुनिया में अधिक से अधिक क्या सजा हो सकती है और सज़ा कैसे दी जा सकती है?, जो खुद की हत्या करता है और साथ में सैकड़ों निर्दोष लोगों के मौत की भी वजह बन जाता है? इस दुनिया का कोई भी क़ानून वयवस्था उसे दंडित करने में सक्षम नहीं होते है क्योंकि वह पहले से ही मर चुका होता है।

हमें अक्सर ये भी सुनने को मिलता है कि बहुत से मामलों में न्यायाधीश, कई दोषियों को उसके जुर्म के संगीनता को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा सुना देते है जो कि 100 साल तक कारावास में रहने के बराबर होता हैं। अगर उसकी मौत इस अवधि से पहले हो जाती है तो क्या दोषी की 100 साल की सजा पूरी होगी? नहीं बल्कि सच्चा और सही न्याय वास्तव में वही होता है जिसमे पीड़ित की आत्मा को भी संतुष्टि मिल जाए, उनका भी ख्याल रखा जाए।

हिटलर जैसे लोगों या किसी आत्मघाती हमलावरों द्वारा मारे गए निर्दोष लोगों को हम क्या उसके जान का पूरा मुआवजा दे सकते हैं? नहीं बिल्कुल नहीं हम उन्हें मुआवजा देने में सक्षम नहीं होंगे क्योंकि वे पहले से ही मर चुके हैं।

इतिहास में कई धर्मी एवं अच्छे कार्य करने वाले लोगों को भी जीवन भर तकलीफ़ दी गईं और कुछ को अन्याय के साथ मार भी दिया गया। क्या आपको नहीं लगता कि उन लोगों को उनकी धार्मिकता या अच्छे कर्म के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए था जो कि संभव नहीं हो पाया ?

तर्कसंगत तरीके से अगर सोचे तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमें निश्चित रूप से मृत्यु के बाद एक अनन्त जीवन की आवश्यकता है ताकि इंसान इस दुनिया में जो कुछ भी अच्छा या बुरा कर्म करता हैं उसके लिए उसे प्रुस्कृत किया जाए या दंडित किया जा सके। और अगर किसी के साथ दुनिया में अन्याय हुआ है तो उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

तर्कसंगत तरीके से अगर सोचे तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमें निश्चित रूप से मृत्यु के बाद एक अनन्त जीवन की आवश्यकता है ताकि लोगों ने इस दुनिया में जो कुछ भी अच्छे बुरे कर्म करते हैं उसके लिए क्षतिपूर्ति की जा सके या दंडित किया जा सके।

मौत के बाद जीवन की इस्लामी अवधारणा

इस्लाम सिखाता है कि एक दिन पूरी दुनिया का अंत हो जाएगा। पहले मनुष्य से लेकर अंतिम मनुष्य तक के सभी लोगों को क़यामत के दिन फिर से जीवित कर दिया जाएगा और उनसे उनके कर्मों के लिए प्रश्न किया जाएगा। जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए हैं और जिन्होंने ईश्वर की आज्ञा के अनुसार जीवन गुज़ारा हैं, उन्हें उसके लिए पृस्कृत किया जाएगा और जिन लोगों ने ईश्वर की अवज्ञा की है, उन्हें दंडित किया जाएगा। जिन लोगों को पृस्कृत किया गया उनका ठिकाना स्वर्ग होगा और जिनको दंडित किया गया उनका ठिकाना नर्क होगा। स्वर्ग और नरक का जीवन अनन्त होगा और कभी खत्म न होगा ।

चूंकि स्वर्ग और नर्क की जीवन अनन्त है और कभी समाप्त नहीं होता है, इसलिए ईश्वर हिटलर और आत्मघाती हमलावरों जैसे लोगों को नरक की आग में छह लाख बार या उससे भी अधिक सजा दे सकते हैं। इसी तरह, वहां ईश्वर उन धर्मी और निर्दोष लोगों को पुरस्कृत करेंगे एवं उनकी क्षतिपूर्ति की जाएगी , जिनके साथ इस दुनिया के जीवन में अन्याय हुआ जिन्हें बिना किसी कारण के मार दिया गया था, उन्हें उतना ही या उससे अधिक देकर उसे खुश किया जायगा जितना वह अपने साथ हुए अन्याय के बदले में चाहता है।

क्या हमारे मरने के बाद हमारा पुनरुत्थान संभव है?

ईश्वर कुरान के अध्याय 36 की छंद 79 में कहते है:

कहो, “वही उन्हें दोबारा जीवन देगा, जिसने उन्हें पहली बार पैदा किया। और वह सर्वव्यापक सृष्टि का ज्ञानी है”

अध्याय 36: छंद 79

हम सभी जानते हैं कि पहली बार किसी चीज़ का निर्माण करना मुश्किल हो सकता है। पर उसी रचना को फिर से दोहराना पहली बार जितना कठिन नहीं होता है। जब ईश्वर को पहली बार हमें पैदा करने में कोई कठिनाई नहीं हुई, तो मरने के बाद उसे हमें जीवन देना क्यों मुश्किल होगा? ईश्वर जिसने हमें पहली बार बनाया है, वह क्यों नहीं मरने के बाद हमें दूसरी बार जीवन दे सकता है? मरने के बाद हमें ज़िंदा वापस लाना वास्तव में ईश्वर के लिए बहुत आसान है।

परलोक की इस्लामी अवधारणा में न्याय के पहलू:

ईश्वर कुरान की अध्याय 18 की छंद 49 में कहते है:

और उनके कर्मों के अभिलेख(पुस्तक) को रखा जाएगा, और तुम अपराधियों को उसके मन में चल रही बातों से डरते हुए देखोगे, और वे मन में कहेंगे, “ओह, हाय, हम पर हाय!” यह कौन सी पुस्तक है जो कुछ भी छोटा या बड़ा नहीं छोड़ती है, सिवाय इसके कि इसमें सब कुछ दर्ज कर दिया गया है? और जो कुछ उन्होंने आने वाले जीवन के लिए प्रस्तुत किया था, वे उसे पा लेंगे। और तुम्हारा ईश्वर किसी के साथ अन्याय नहीं करता

अध्याय 18: छंद 49

टिप्पणी: तो प्रत्येक अपराधी को ये पता होगा कि उसने क्या किया और उसके लिए उसे क्या दंड दिया जा रहा है।

ईश्वर कुरान की अध्याय 3 के छंद 185 में कहते है:

हर एक व्यक्ति मृत्यु का स्वाद चखेगा और तुम्हें कयामत के दिन ही तुम्हारे कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा। अतः जो कोई आग से दूर हो गया और जन्नत में दाख़िल हो गया, वह उसकी इच्छा को प्राप्त कर चुका होगा । और भ्रम के आनंद के अलावा इस दुनिया के जीवन का कोई हकीकत नहीं है

अध्याय 3: छंद 185

टिप्पणी: इस दुनिया में जिनके साथ जुल्म होता है उन्हें को निराशा या आशा खोने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि निर्णय के दिन, उन्हें उस जुल्म का पूरा मुआवजा दिया जाएगा। जिससे वो संतुष्ट हो जाएगा।

ईश्वर कुरान की अध्याय 99 के छंद 7 और 8 में कहते है:

तो जो कोई भी एक राई के दाने के वजन के बराबर भी अच्छे कर्म करता है, वह उसे देखेगा, और जो कोई भी एक राई के दाने के वजन के बराबर बुरे कर्म करता है वह उसे देखेगा

अध्याय 99: छंद 7 और 8

ईश्वर कुरान की अध्याय 3 के छंद 30 में कहते है:

वह दिन आने वाला है जिस दिन हर एक व्यक्ति को अपने किए गए कर्मों का फल मिल जाएगा चाहे उसने अच्छे कर्म किए हो या बुरे कर्म किए हो, वह चाहेगा कि बुरे कर्म और उसके बीच बहुत दूरी हो। ईश्वर तुम्हें अपने बारे में चेतावनी देता है और ईश्वर अपने बन्दों पर मेहरबान है।

अध्याय 3: छंद 30

टिप्पणी: इंसान अपने द्वारा किए गए हर काम के लिए ईश्वर के समक्ष जवाबदेह होगा और उसे पुरस्कृत या दंडित होने से कोई बचा नहीं सकता है।

ईश्वर कुरान के अध्याय 4 छंद 40 में कहते है:

वास्तव में, ईश्वर किसी के साथ एक राई के दाने के वजन के बराबर भी अन्याय नहीं करता है, जबकि यदि कोई अच्छा कर्म करे, तो वह उसे कई गुणा कर देता है और अपनी ओर से एक बड़ा प्रतिफल देता है

अध्याय 4: छंद 40

टिप्पणी: किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया जाएगा और लोगों को उनके अच्छे कार्यों के लिए कई बार मुआवजा दिया जाएगा ये बात हर इंसान को जितना संभव हो सके उतने अच्छे काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

विकलांग बच्चों, प्रारंभिक मौतों आदि के लिए स्पष्टीकरण:

कुरान सिखाता है कि यह पूरा जीवन सिर्फ एक परीक्षा है और सभी मनुष्यों के अस्तित्व का एक अस्थायी स्थान है।

ईश्वर कुरान की अध्याय 67 के छंद 2 में कहते है:

उसने मृत्यु और जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले सके कि तुममें से कौन कर्म में श्रेष्ठ है और वही प्रभुत्वशाली, और क्षमाशील है

अध्याय 67: छंद 2

इस संसार में लोगों की विभिन्न तरीकों से परीक्षा ली जाती है। यह परीक्षा धन, स्वास्थ्य, दीर्घायु आदि के माध्यम से हो सकता है।

उदाहरण के लिए: न्याय के दिन, एक धनी व्यक्ति से पूछा जाएगा कि उसने अपनी संपत्ति कैसे खर्च की। दूसरी ओर, एक गरीब आदमी को धन पर सवाल के लिए पूरे अंक मिलेंगे, क्योंकि उसे संसार में गरीबी का सामना करना पड़ा था।

न्याय के दिन, हमसे पूछा जाएगा कि हमने इस धरती पर अपनी आँखों का इस्तेमाल कैसे किया। दूसरी ओर, एक अंधे व्यक्ति को डिफ़ॉल्ट रूप से आंखों के उपयोग पर प्रश्न के लिए पूरे अंक मिलेंगे।

फैसले के दिन, हमसे पूछा जाएगा कि हमने अपने अंगों का उपयोग कैसे किया। दूसरी ओर, एक विकलांग व्यक्ति को डिफ़ॉल्ट रूप से अंगों के उपयोग पर प्रश्न के लिए पूर्ण अंक मिलेंगे।

आप देख सकते हैं कि फैसले के दिन भी चीजें कैसे मिलेंगी।

किसी भी इंसान के साथ अन्याय नहीं

ईश्वर कुरान के अध्याय 4 छंद 40 में कहते है:

निस्संदेह, ईश्वर अन्याय नहीं करता, यहाँ तक कि एक राई के दाने के बराबर भी नहीं

अध्याय 4: छंद 40

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