अज़ान – प्रार्थना करने के लिए पुकार

मंदिरों, चर्चों और मस्जिदों जैसे पूजा स्थलों में लाउडस्पीकरों का उपयोग होना कोई नई घटना नहीं है। पूजा के सभी स्थानों ने अतीत में भी लाउडस्पीकरों का उपयोग किया है और बिना किसी मुद्दे के इसका उपयोग करते आ रहे हैं। भारत एक आध्यात्मिक देश है और इसकी एक समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा रही है। अगर दुनिया में कोई ऐसा देश है जो आध्यात्मिकता की सराहना कर सकता है, तो वह भारत है। आध्यात्मिक प्राणी होने के नाते, हम में से किसी को आध्यात्मिकता से संबंधित पहलुओं के साथ कोई समस्याएं कैसे हो सकती हैं?

अल्लाहु अकबर... अल्लाहु अकबर
अल्लाहु अकबर... अल्लाहु अकबर...

दिन में पांच बार, आपको अपने आस-पास की मस्जिद के लाउड स्पीकरों से ये शब्द सुनने को मिलते होंगे। हाल ही में, अज़ान के बारे में कई विवाद सुनने को मिले। आइए समझते हैं कि अज़ान क्या है और हमें इन विवादों को कैसे देखना चाहिए।

अजान क्यों?

इस्लाम ने मुसलमानों के लिए दिन में पांच बार निर्धारित समय पर नमाज़(प्राथना) अनिवार्य की गई है। मुसलमान इन पांच अनिवार्य नमाज़ों को एक साथ अदा करने के लिए मस्जिदों में इकट्ठा होते हैं।

प्रार्थना के लिए निर्धारित समय का आंकलन सूर्य की गति के आधार पर तय किया जाता है, चूँकि सूर्योदय और सूर्यास्त का समय बदलता रहता है इसलिए इसके अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त से पहले या बाद वाली प्रार्थनाओं के समय में भी बदलाव होते रहते हैं। मुसलमानों को प्रार्थना के इस निश्चित समय को, समय पर याद दिलाने की आवश्यकता होती है ताकि वे प्रार्थना के लिए मस्जिद पहुंच जाए। इस प्रकरण को “अज़ान – प्रार्थना के लिए पुकार” के रूप में स्थापित किया गया है। मुसलमान अज़ान की पुकार सुनते ही मस्जिद की तरफ जाते हैं और सब मिलकर नमाज़ अदा करते हैं।

अजान की शुरुआत कैसे हुई?

पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) के समय में, “प्रार्थना के लिए पुकार” को लेकर कई विकल्प सामने आए । कुछ ने घंटी बजाने का सुझाव दिया, कुछ ने सुझाव दिया कि हॉर्न बजाया जा सकता है, और कुछ ने यह भी सुझाव दिया कि आग को जलाया जा सकता है। पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) ईश्वर से प्रेरित होकर, “प्रार्थना के पुकार” के लिए “मानव आवाज” का उपयोग करना सही समझा | यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) ने एक घंटी या एक हॉर्न नहीं चुना जो मानव आवाज या आग की तुलना में ज्यादा तेज एवं भ्रामक हो सकता था परन्तु कोई सोच सकता है कि पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) ने ऐसा क्यों किया ?। एक मानव आवाज में दिया गया “अजान” उस व्यक्ति के लिए एक आध्यात्मिक चेतना का अनुभव कराता है जो इसे देता है और जो इसे सुनता है।

अज़ान के शब्दों का अर्थ

अल्लाहु अकबर = ईश्वर सबसे बड़ा है

अश्हदुअल्ला इलाहा इल्लल्लाह = मैं गवाही देता हूँ कि कोई भी पूजा और आज्ञाकारिता के लायक नहीं है सिवाय अल्लाह के|

अश्हदुअन्न मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह = मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल (दूत) हैं

हया अल-सलाह = प्रार्थना के लिए आओ

हया अल-फलाह = सफलता के लिए आओ

नोट: अल्लाह मुसलमानों का व्यक्तिगत ईश्वर नहीं है। अल्लाह “ईश्वर/भगवान/परमेश्वर” के लिए प्रयोग किया जाने वाला अरबी शब्द है। सभी अरब, ईसाई और यहूदी परमेश्वर को सम्बोधित करने के लिए “अल्लाह” शब्द का उपयोग करते हैं। “भगवान” का अरबी में अनुवाद करने के लिए गूगल अनुवाद का उपयोग करें। वह कहेगा “अल्लाह”।

अजान एक आध्यात्मिक अनुभव है

अगर कोई अज़ान के वाक्यांशों का अनुवाद पढ़ता है, तो आप सहमत होंगे कि इसमें कुछ भी आपत्तिजनक शव्द नहीं है। आइए अब वाक्यांशों के पीछे आध्यात्मिक अर्थ को देखें।

अल्लाहु अकबर – ईश्वर सबसे बड़ा है

हर कोई व्यक्ति जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इस बात से सहमत होगा कि परमेश्वर सबसे बड़ा है।

अश्हदुअल्ला इलाहा इल्लल्लाह – मैं गवाह हूं कि ईश्वर के अलावा कोई भी पूजा और आज्ञाकारिता के योग्य नहीं है।

चूँकि परमेश्वर सबसे बड़ा है, इसलिए व्यक्ति को केवल परमेश्वर की आराधना और आज्ञा का पालन करना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति विशेष, या इस संसार में उदगम हुए किसी और चीज़ की। यह बहुत ही तर्कसंगत है और हर किसी को इसे स्वीकार करना चाहिए।

अश्हदुअन्न मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह = मैं गवाह हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के दूत हैं

पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) अंतिम पैगंबर हैं जिन्होंने हमें ईश्वर की पूजा और आज्ञाकारिता के बारे में सिखाया था। इसलिए, मुसलमानों को प्रार्थना करने के आह्वान में उनके बारे में याद दिलाया जाता है। यदि आप सोच रहे हैं कि परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता (पैग़म्बर) कौन हैं, तो आप इसके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। यहाँ पढ़ें

हया अल-सलाह – प्रार्थना के लिए आओ

मनुष्य, परमेश्वर की आज्ञा का पालन और आराधना करना चाहता हैं, पर कभी कभी वो रोज़मर्रा की जिंदगी में विचलित हो जाता हैं और कभी सांसारिक सुखों में डूब जाता हैं जो उन्हें पाप और अनैतिकता के मार्ग पे ले जा सकती है । यह अतिआवश्यक है कि मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ दिन में नियमित अंतराल पर जुड़ें रहे ताकि वह सचेत रहे एवं पापों और अनैतिकताओं से खुद को शुद्ध कर सकें।

पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) ने कहा:

“अगर आपके दरवाजे पर एक नदी हो और आप दिन में पांच बार उसमें स्नान करते हैं, तो क्या आप अपने ऊपर किसी भी गंदगी को पाएँगे ?” उनके आस-पास के लोगों ने कहा: “गंदगी का एक निशान भी नहीं रहेगा । पैगंबर ने कहा, “यह उन पांच प्रार्थनाओं का उदाहरण है जिनके द्वारा ईश्वर मनुष्यों को पापों से शुद्ध करता है। (संदर्भ: साहिह बुखारी)।

हया अल-फलाह – सफलता के लिए आओ

इस्लाम सिखाता है कि यह शब्दपूर्ण जीवन अस्थायी है और मृत्यु के बाद का जीवन अनन्त और अंतहीन है। जो लोग अच्छे कर्म करते हैं और एकेश्वरवाद का पालन करते हुए जीवन गुजारते है, वे मृत्यु के बाद के जीवन में सफल होंगे, जबकि बुरे कर्म करने वाले मृत्यु के बाद के जीवन में विफल होंगे। आप यहां मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में अधिक पढ़ सकते हैं। यहाँ पढ़ें

चूंकि दैनिक प्रार्थनाएं सृष्टिकर्ता से जुड़ने और पापों और अनैतिकताओं से शुद्ध होने का एक शक्तिशाली तरीका है, इसलिए एक व्यक्ति जो इन प्रार्थनाओं को समझ कर और ईमानदारी के साथ खुद को इसके लिए प्रस्तुत करता है, वह केवल अच्छे कर्म करने का प्रयास करेगा और बुरे कर्मों से दूर रहेगा। इसलिए, दैनिक प्रार्थनाएं मृत्यु के बाद जीवन में सफलता का एक मात्र रास्ता हैं। इसलिए ये वाक्यांश है कि “सफलता के लिए आओ”।

गैर-मुस्लिम और अज़ान

अज़ान सुनकर रो पड़े बीबीसी रिपोर्टर
लियाम नीसन को अज़ान सुनना बहुत पसंद था
मॉर्गन फ्रीमैन का कहना है कि कॉल टू प्रेयर (अज़ान) दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज़ों में से एक है

अज़ान – हर इंसान को नेक और अच्छा होने की याद दिलाता है

हम में से अधिकांश इस बात से सहमत होंगे कि दुनिया में अनैतिकताएं, अनिर्णय और अपराध बढ़ रहे हैं। हम बहुत तेज़ी से एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जो नैतिकता से रहित, बहुत ही स्वार्थी और अत्यधिक भौतिकवादी है। उदहारण के लिए वृद्ध माता-पिता को उनके बच्चे छोड़ देते है, आए दिन वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इसलिए इस तरह के समय में, अच्छे कर्मों को करने हेतु परमेश्वर के साथ जुड़ने के लिए एक दैनिक वेक अप कॉल और अनुस्मारक समय की आवश्यकता है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

अज़ान और लाउडस्पीकर

मंदिरों, चर्चों और मस्जिदों जैसे पूजा स्थलों में लाउडस्पीकरों का उपयोग होना कोई नई घटना नहीं है। पूजा के सभी स्थानों ने अतीत में भी लाउडस्पीकरों का उपयोग किया है और बिना किसी मुद्दे के इसका उपयोग करते आ रहे हैं। भारत एक आध्यात्मिक देश है और इसकी एक समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा रही है। अगर दुनिया में कोई ऐसा देश है जो आध्यात्मिकता की सराहना कर सकता है, तो वह भारत है। आध्यात्मिक प्राणी होने के नाते, हम में से किसी को आध्यात्मिकता से संबंधित पहलुओं के साथ कोई समस्याएं कैसे हो सकती हैं?

साथ ही मुसलमानों और अन्य धर्मों के लोगों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि किसी ऐसे विषम परिस्तिथि में जब शिशुओं, बीमार लोगों और बुजुर्गों को लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल से परेशानी हो सकती है तो ऐसी स्तिथि में ये सुनिश्चित किया जाए की उच्च ध्वनी के लाउडस्पीकर का प्रयोग न करें । बेहतर होगा कि वे लाउडस्पीकरों के इस तरह के इस्तेमाल से बचें जिससे दूसरों को असुविधा हो।

इस मामले में इस्लाम का मार्गदर्शन बहुत स्पष्ट है। पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) ने कहा:

मुसलमान वह व्यक्ति है जिसकी जीभ और हाथ से लोग सुरक्षित हैं, और आस्तिक वह व्यक्ति है जिससे लोगों का जीवन और धन सुरक्षित है।

संदर्भ:सुनान नसाइ

एक सच्चा मुसलमान अपने कर्मों के लिए किसी को परेशानी नहीं पहुंचा सकता है। इसलिए मुसलमानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लाउडस्पीकरों का डेसीबल स्तर माननीय न्यायालयों के मार्गदर्शन के अनुसार हो। हम आशा करते हैं कि अन्य धर्मों के लोग भी लाउडस्पीकरों का उपयोग करते समय माननीय न्यायालयों के मार्गदर्शन का पालन करेंगे।

WHAT OTHERS ARE READING

Most Popular